मिल्कीपुर: अयोध्या के मिल्कीपुर विधानसभा उपचुनाव में सियासी पारा चरम पर है। जहां एक ओर सीएम योगी आदित्यनाथ के छह दौरों से बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करती दिख रही है वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) सहानुभूति बटोरने की रणनीति में जुटी है। हाल ही में हुई एक दलित बेटी की हत्या पर सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने आंसू बहाकर संवेदनाओं को जगाने की कोशिश की है जिसको योगी आदित्यनाथ ने 'नौटंकी' करार देते हुए चुनावी ड्रामा करार दिया।
5 फरवरी को होने वाले इस उपचुनाव में मायावती के दलित वोट बैंक का झुकाव तय करेगा कि जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा। चुनावी रणभूमि में बीजेपी और सपा के बीच कांटे की टक्कर है जिसमें जातीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
राजनीतिक माहौल: किसकी हवा भारी?
एनसीआर पत्रिका की टीम ने मिल्कीपुर के जमीनी हालात का जायजा लिया और पाया कि यहां बीजेपी और सपा के बीच सीधी टक्कर है। सत्तारूढ़ पार्टी के सात मंत्री लगातार कैंप कर रहे हैं जबकि सपा की ओर से डिंपल यादव ने रोड शो के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की है।
बीजेपी की रणनीति ब्राह्मण, ठाकुर, ओबीसी और गैर-पासी वोट बैंक पर केंद्रित है। पार्टी मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। वहीं सपा यादव, एससी, मुस्लिम और पासी वोट बैंक पर भरोसा कर रही है।
आइए इन प्रमुख बिंदुओं में समझें चुनावी गणित
1. बीजेपी के मजबूत गढ़:
कुमारगंज, अमानीगंज, खंडासा, कुचेरा बाजार और गदुरही बाजार जैसे क्षेत्रों में बीजेपी की स्थिति मजबूत दिख रही है। इन इलाकों में जातीय समीकरण बीजेपी के पक्ष में नजर आ रहे हैं।
2. सपा के प्रभाव वाले क्षेत्र:
बारून बाजार, धर्मगंज बाजार, हरनटीनगंज, आनंद नगर भटारी और रेवतीगंज जैसे क्षेत्रों में सपा का प्रभाव अधिक है। वहीं मिल्कीपुर और तुरसमपुर बाजार में दोनों दलों के बीच कड़ी टक्कर है।
3. सपा-कांग्रेस गठबंधन का असर:
सपा-कांग्रेस गठबंधन और अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने सपा के प्रत्याशी को मजबूती दी है लेकिन आजाद समाज पार्टी का प्रभाव सपा की रणनीति में खलल डाल सकता है।
4. बसपा का खेल:
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 46 हजार वोट मिले थे जबकि सपा 13 हजार वोटों से जीत दर्ज कर सकी थी। इस बार बसपा ने उम्मीदवार नहीं उतारा है जिससे उसके वोट बैंक का झुकाव निर्णायक साबित होगा।
5. जातीय समीकरण का महत्व:
सवर्ण और ओबीसी वोट बैंक पर कब्जा जमाने वाली पार्टी ही बाजी मारेगी। बीजेपी का ब्राह्मण और ठाकुर वोट बैंक मजबूत है जबकि सपा यादव, एससी और मुस्लिम वोटरों पर निर्भर है।
6. पिछले चुनावों का रुझान:
पिछले पांच चुनावों में सपा ने तीन बार, बीजेपी और बसपा ने एक-एक बार जीत दर्ज की है। हालिया चुनावों में बीजेपी और सपा के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिली है।
मिल्कीपुर के जमीनी मुद्दे: विकास बनाम जातीय समीकरण
जमीनी स्तर पर चुनावी मुद्दे जाति-धर्म से आगे बढ़कर स्थानीय समस्याओं पर केंद्रित हैं। बेटियों की सुरक्षा, बिजली आपूर्ति, छुट्टा मवेशियों की समस्या और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे लोगों के बीच चर्चा का विषय हैं।
बेटियों की सुरक्षा:
हाल में हुई घटना के कारण बेटियों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया है। सपा इस मुद्दे को भावनात्मक रूप से भुनाने की कोशिश कर रही है जबकि बीजेपी इस पर आक्रामक रुख अपनाए हुए है।
छुट्टा मवेशियों की समस्या:
किसान छुट्टा पशुओं से बेहद परेशान हैं। फसलों की रक्षा के लिए उन्हें रातभर जागना पड़ता है। किसानों का कहना है कि नेता सिर्फ वादे करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अलग है।
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली:
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। जहां डॉक्टरों की नियुक्ति है वहां भी वे समय पर नहीं पहुंचते है जिससे मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
आवास और पेंशन की समस्याएं:
कई दिव्यांग और गरीब परिवार अब भी आवास और पेंशन से वंचित हैं। 30 साल से आवास के लिए दौड़ रहे दिव्यांग जमुना प्रसाद दुबे जैसे लोग सरकार से निराश हैं।
नेताओं की रणनीति: सपा बनाम बीजेपी
बीजेपी प्रत्याशी का दावा:
बीजेपी प्रत्याशी का कहना है कि मिल्कीपुर की जनता भाजपा के पक्ष में एकजुट है। वे दावा करते हैं कि अवधेश प्रसाद के बेटे अजीत प्रसाद का राजनीति में अनुभव कम है और यह उनके खिलाफ जा सकता है।
सपा प्रत्याशी का आत्मविश्वास:
सपा के अजीत प्रसाद का कहना है कि उनके पिता अवधेश प्रसाद यहां के लोकप्रिय नेता रहे हैं और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वे दावा करते हैं कि चुनाव एकतरफा है और बीजेपी सिर्फ दिखावा कर रही है।
सपा जिलाध्यक्ष की राय:
सपा के जिलाध्यक्ष पारसनाथ यादव का कहना है कि सपा हमेशा चुनावी मोड में रहती है और किसानों, छात्रों, पिछड़ों और दलितों के मुद्दे उठाती रहती है।
जातिगत समीकरण: किसकी पकड़ मजबूत?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बीजेपी गैर-पासी वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। ब्राह्मण, ठाकुर और गैर-पासी वोट बैंक अगर एकजुट हो जाता है तो बीजेपी की राह आसान हो सकती है।
वहीं सपा मुस्लिम, यादव और पासी वोट बैंक को साधने की कोशिश में है। पासी वोट बैंक के तीन हिस्सों में बंटने की संभावना है जिससे बीजेपी को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल सकता है।
आजाद समाज पार्टी का असर भी दिलचस्प रहेगा। अगर वह मायावती के वोट बैंक में सेंध लगा पाई तो बीजेपी के लिए रास्ता और साफ हो सकता है।
अब परिवारवाद नहीं, विकास बना मिल्कीपुर के लोगों का असली मुद्दा
मिल्कीपुर के चुनावी माहौल को समझने के दौरान सबसे पहले हमारी मुलाकात एक स्थानीय व्यापारी से हुई। उन्होंने कहा कि डिंपल यादव के रोड शो ने जरूर थोड़ी हलचल मचाई है लेकिन अब जनता का रुख बदल रहा है। लोग अब सिर्फ परिवारवाद की राजनीति से आगे बढ़कर बदलाव की चाह रखते हैं और विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं।
जमीन मुआवजा बना बड़ा सवाल
इसके बाद हमारी बातचीत राम जतन गौड़ से हुई जो जमीन अधिग्रहण से जुड़ी समस्याओं को लेकर बेहद परेशान हैं। उन्होंने बताया कि अयोध्या में 84 कोस परिक्रमा मार्ग के विस्तार के चलते कई लोगों की जमीन अधिग्रहित की गई है लेकिन मुआवजे का भुगतान उचित तरीके से नहीं किया गया। वे सवाल उठाते हैं कि क्या लोग वोट देने से पहले इस गंभीर मुद्दे पर विचार नहीं करेंगे?
किसानों के लिए छुट्टा पशु बना सबसे बड़ी चुनौती
मिल्कीपुर में किसानों के बीच सबसे ज्वलंत मुद्दा छुट्टा मवेशियों की समस्या है। किसान जगदंबा प्रसाद यादव ने बेबाकी से कहा कि वे न तो डिंपल यादव के रोड शो में गए और न ही योगी आदित्यनाथ की जनसभा में। उनके मुताबिक चुनावी वादों से ज्यादा अहम है कि कौन छुट्टा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान करता है। उन्होंने कहा, "नेता दावा करते हैं कि छुट्टा जानवरों को पकड़ लिया गया है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। किसान अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए रातों को जागने को मजबूर हैं।"
30 साल से आवास के लिए भटक रहे दिव्यांग
स्थानीय निवासी दिव्यांग जमुना प्रसाद दुबे की कहानी दिल को छू लेने वाली है। वे पिछले 30 वर्षों से सरकारी आवास पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ। वे कहते हैं, "चाहे बीजेपी की जनसभा हो या सपा का रोड शो आम लोगों के जीवन पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। हम जैसे कितने ही लोग हैं जो दूसरे के घर में रहने को मजबूर हैं। न आवास मिला, न पेंशन। आखिर हम करें तो क्या करें?"
उनकी बातों से साफ जाहिर है कि जनता अब खोखले वादों से थक चुकी है और वास्तविक मुद्दों जैसे आवास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देने वाली सरकार चाहती है।
कौन मारेगा बाजी?
मिल्कीपुर उपचुनाव जातीय समीकरण, विकास के मुद्दे और नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ के बीच घिरा हुआ है। जहां बीजेपी अपनी सरकार की उपलब्धियों और संगठन की ताकत के भरोसे है वहीं सपा भावनात्मक मुद्दों और जातीय समीकरण पर दांव खेल रही है।
मायावती के वोट बैंक का झुकाव, पासी समाज का बंटवारा और छुट्टा मवेशियों जैसे स्थानीय मुद्दे अंतिम परिणाम पर निर्णायक असर डाल सकते हैं। 5 फरवरी को मिल्कीपुर के मतदाता तय करेंगे कि अगली जीत का ताज किसके सिर सजेगा—सपा के पुराने तजुर्बे के साथ या बीजेपी के नए भरोसे के साथ।