बनारस में जलती चिताओं के बीच लगे ठुमके, गाएं गए भजन: जानें क्या हैं मान्यता! क्यों नगरवधुओं ने श्मशान में...जानें 400 साल पुरानी अनोखी परंपरा?
बनारस में जलती चिताओं के बीच लगे ठुमके, गाएं गए भजन

वाराणसी: दरअसल शिवनगरी के पवित्र मणिकर्णिका घाट पर बीती रात एक अनूठा दृश्य देखने को मिला जहां नगरवधुओं ने जलती चिताओं के बीच भगवान शिव को समर्पित नृत्य प्रस्तुत किया। यहां एक ओर चिताएं जल रही थीं तो दूसरी तरफ नृत्य हो रहा था। पूरी रात लोग महाश्मशान में बैठकर उत्साह के साथ डांस देखते रहे। चिता की ज्वाला की गर्मी और डोमराज की मढ़ी के नीचे घुंघरुओं की झंकार का दृश्य जितना विरोधाभासी था उतना ही आध्यात्मिक भी।

नगरवधुओं ने भावपूर्ण भजनों से बाबा मसाननाथ को प्रसन्न करने का प्रयास किया और उनसे प्रार्थना की कि अगले जन्म में उन्हें यह जीवन न मिले।

बाबा मसाननाथ के दरबार में सजी आध्यात्मिक महफिल!

बाबा मसाननाथ का दरबार पुष्पों से सुसज्जित किया गया। गुलाब, चमेली, रजनीगंधा और गेंदा की महक से पूरा क्षेत्र महक उठा। बाबा को भोग अर्पित कर भव्य आरती की गई। इसके उपरांत नगरवधुओं का मंच सजा। जहां पूरी रात भक्ति भाव से ओतप्रोत नृत्य और भजन की प्रस्तुति हुई। जहां नगरवधुओं के "डिमिग डिमिग डमरू कर बाजे", "दुर्गा दुर्गति नाशिनी" जैसे भजनों से लोग मंत्रमुग्ध हो गए।

कैसे शुरू हुई यह परंपरा?

काशी को सिर्फ मोक्ष की नगरी नहीं बल्कि अद्वितीय परंपराओं की भूमि भी माना जाता है। चैत्र नवरात्र की सप्तमी को प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला यह आयोजन करीब 400 वर्षों से चला आ रहा है। जब राजा मानसिंह ने मणिकर्णिका घाट के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तो इस पावन भूमि पर सांस्कृतिक आयोजन की कल्पना की। लेकिन श्मशान की पृष्ठभूमि होने के कारण कोई भी कलाकार वहां प्रस्तुति देने को तैयार नहीं हुआ। ऐसे में नगरवधुओं ने आगे बढ़कर यह जिम्मा लिया और इसे आत्मिक शुद्धि का माध्यम माना।

मोक्ष की आशा में 400 सालों से प्रस्तुत करती आ रहीं हैं नृत्य

नगरवधुएं इस आयोजन को केवल परंपरा नहीं मानतीं बल्कि इसे अपनी आत्मा की आवाज मानती हैं। उनका मानना है कि शिव के दरबार में इस तरह नृत्य अर्पित कर वे अपने जीवन के पापों का प्रायश्चित करती हैं और अगले जन्म में एक सच्चे, ससम्मान जीवन की कामना करती हैं।

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