प्रेमानंद महाराज के जन्मदिन पर उमड़ा भक्तों का सैलाब, ऐसे किया भव्य स्वागत!: जानें अनिरुद्ध कैसे बने प्रेमानंद, 13 की उम्र में घर छोड़ने से लेकर संत बनने तक पूरी कहानी
प्रेमानंद महाराज के जन्मदिन पर उमड़ा भक्तों का सैलाब, ऐसे किया भव्य स्वागत!

वृंदावन: हिंदू नववर्ष के अवसर पर संत प्रेमानंद महाराज का जन्मदिन धूमधाम के साथ मनाया गया। उनकी इस पदयात्रा में देशभर से करीब 2 लाख भक्त उमड़े। वहीं हर कोई उनके दर्शन करके बधाई देने की चाहत में देर शाम से ही पदयात्रा के रास्ते में आकर खड़े हो गए थे।बता दें कि भक्तों ने पदयात्रा का 2 किलोमीटर रास्ता भी सजा रखा था। वहीं 10 क्विंटल गेंदा तथा गुलाब के फूलों से सड़क पर रंगोली भी बनाई गई थी। आतिशबाजी की जा रही थी और जगह-जगह पर भक्त राधा नाम का कीर्तन करते नजर आए।

प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा में ऊंट एवं घोड़े भी रहे शामिल:

गौरतलब है कि प्रेमानंद महाराज के द्वारा वृंदावन की श्री कृष्णम शरणम् सोसाइटी से तड़के सुबह 2 बजे ही पदयात्रा शुरू की गई थी। वहीं 2 किलोमीटर का यह सफर तय करते हुए वह रमणरेती स्थित अपने आश्रम केली कुंज पहुंचे। इस बीच लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया और धूमधाम से जन्मदिन मनाया गया।

दरअसल रात 2 बजे संत प्रेमानंद महाराज जब पदयात्रा करने निकले तो सबसे आगे घोड़े एवं उसके पीछे ऊंट चल रहे थे। इसके पश्चात अलग-अलग राज्यों के वाद्य यंत्र धार्मिक ध्वनियां बजाते हुए चल रहे थे। महिलाएं सिर पर कलश लेकर प्रेमानंद जी महाराज के आगे आगे चल रही थीं। वहीं जन्मदिन पर बधाई देने में कोई कोर कसर न छूट जाए, इसकी भक्तों ने भरपूर कोशिश की थी।

देर शाम से ही महाराज के दर्शन के लिए बैठे थे भक्त:

आपको बता दें कि संत प्रेमानंद जी महाराज का जन्मदिन मनाने के लिए कोई भक्त जम्मू से आया है तो कोई हरियाणा से, वहीं कोई राजस्थान से आया तो कोई भक्त महाराष्ट्र से वृंदावन आया है। लेकिन सभी की बस एक ही चाहत थी कि जन्मदिन के इस मौके पद महाराज की एक झलक मिल जाए।

इसलिए भक्तों ने देर शाम से ही पदयात्रा के रास्ते में अपना डेरा जमा लिया था, जिसको जहां जगह मिली वह बैठ गया। क्या बुजुर्ग, क्या बच्चे, क्या महिला तथा क्या युवा, सभी शाम से ही सड़क के किनारे बैठने लग गए। स्थिति यह थी कि अगर किसी को नींद आई तो सड़क किनारे जहां पर बैठे थे, वहीं पर सो गए। रात बढ़ी और जब सर्दी लगने लगी तो जो पॉलीथिन बैठने के लिए खरीदी थी, भक्तों ने उसी को ओढ़ लिया।

प्रेमानंद महाराज ने अपने भक्तों का किया अभिवादन:

ग़ौरतलब है कि रोज की तरह ही संत प्रेमानंद महाराज अपनी पदयात्रा करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे थे। लेकिन दर्शन के लिए खड़े अपने भक्तों का प्रेमानंद महाराज के द्वारा हाथ उठाकर सभी भक्तों का अभिवादन किया गया और उनको आशीर्वाद दिया। वहीं अधिकतर भक्त उनको उपहार देने के लिए भी लाए थे। लेकिन महाराज के स्वास्थ्य कारणों की वजह से उन तक नहीं पहुंच सके।

सुरक्षा के लिए किए गए कड़े इंतजाम:

आपको बता दें कि प्रेमानंद महाराज जी के जन्मदिन के अवसर पर निकली पदयात्रा के दौरान सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे। दरअसल पदयात्रा की सुरक्षा व्यवस्था के लिए 3 एसपी (SP) तथा 4 सीओ (CO) के अतिरिक्त थाना प्रभारी एवं चौकी प्रभारी भी लगे हुए थे।

आइए जानते हैं कि आखिर कौन हैं प्रेमानंद महाराज जी और क्या है उनके प्रसिद्ध संत बनने तक की पूरी कहानी:

13 साल की उम्र में ही महाराज ने छोड़ दिया था अपना घर:

आपको बता दें कि प्रेमानंद महाराज का जन्म एवं पालन पोषण कानपुर के अखरी गांव में हुआ था। यहीं से निकलकर वह इस देश के करोड़ों लोगों के मन में जाकर बस गए। दरअसल उनके बड़े भाई गणेश दत्त पांडे बताते हैं कि मेरे पिता शंभू नारायण पांडे एवं मां रामा देवी हैं। उन्होंने बताया कि हम कुल 3 भाई हैं, जिसमें प्रेमानंद मंझले हैं। साथ ही प्रेमानंद हमेशा से प्रेमानंद महाराज जी नहीं थे। बचपन में हमारे मां-पिता के द्वारा बड़े प्यार से उनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे रखा गया था।

हर पीढ़ी में निकलता है कोई न कोई एक बड़ा साधु-संत:

भाई गणेश पांडे बताते हैं कि हमारे पिताजी पुरोहित का काम करते थे। साथ ही मेरे घर की हर पीढ़ी में कोई न कोई एक बड़ा साधु-संत होकर निकलता है है। पीढ़ी दर पीढ़ी अध्यात्म की तरफ झुकाव होने के चलते अनिरुद्ध भी बचपन से ही काफी आध्यात्मिक रहे हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में पूरा परिवार प्रतिदिन एक साथ बैठकर घर में ही पूजा-पाठ करता था और अनिरुद्ध यह सब करते हुए बड़े ध्यान से सभी को देखा और सुना करता था।

शिव मंदिर में चबूतरा बनाने से रोकने पर तो घर छोड़ दिया:

वहीं बचपन में अनिरुद्ध ने अपनी एक सखा टोली के साथ मिलकर शिव मंदिर के लिए एक चबूतरा बनाना चाहा था।  इसका निर्माण भी शुरू करवाया गया था लेकिन कुछ लोगों के द्वारा इसे रोक दिया गया था। इससे वह बेहद मायूस हो गए और उनका मन इस कदर टूटा कि उन्होंने अपना घर ही छोड़ दिया।

हालांकि घरवालों ने उनकी काफी खोजबीन की और लंबे समय बाद काफी मशक्कत करने पर पता चला कि वह सरसौल में नंदेश्वर मंदिर पर रुके हुए हैं। घरवालों के द्वार उन्हें घर वापस लाने का हर जतन किया गया, लेकिन अनिरुद्ध किसी की बात नहीं माने। 

वहीं फिर कुछ दिनों पश्चात बची-खुची मोह माया को भी छोड़कर अनिरुद्ध सरसौल छोड़कर भी चले गए। जिसके बाद वह काशी जाकर वहां प्रवास की जिंदगी बिताने लगे। बता दें कि संन्यासी जीवन की दिनचर्या में प्रेमानंद महाराज जी ने कई दिन बिना कुछ खाए ही बिताए थे।

नंदेश्वर से महराजपुर एवं कानपुर और फिर काशी पहुंचे:

वर्तमान समय में जिन प्रेमानंद महाराज जी के भक्तों में आम आदमी से लेकर सेलिब्रिटी तक सभी शुमार हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई सिर्फ 8वीं कक्षा तक ही हुई है। हालांकि 9वीं कक्षा में भास्करानंद विद्यालय में एडमिशन दिलाया गया था लेकिन उन्होंने 4 महीने में ही स्कूल छोड़ दिया था।इसके पश्चात वह भगवान की भक्ति में ही लीन हो गए। वहीं सरसौल नंदेश्वर मंदिर से जाने के पश्चात वह महराजपुर के सैमसी में स्थित एक मंदिर में भी कुछ दिनों तक  रुके। फिर वह कानपुर के बिठूर चले गए और रहने लगे, लेकिन उसके बाद महाराज काशी चले गए।

संन्यासी जीवन में कई दिनों तक भूखे भी रहे:

वहीं काशी में उन्होंने करीब 15 महीने बिताए और उन्होंने गुरु गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा भी ली। बता दें कि वाराणसी में संन्यासी जीवन के दौरान वह रोज गंगा में 3 बार स्नान करते थे। तुलसी घाट पर भगवान शिव तथा माता गंगा का ध्यान-पूजन करते थे।साथ ही दिन में केवल 1 बार ही भोजन करते थे। प्रेमानंद महाराज भिक्षा मांगने की जगह पर भोजन प्राप्ति की इच्छा से 10-15 मिनट बैठे रहते थे। अगर इतने समय में कोई भोजन मिला तो उसे ग्रहण करते थे, नहीं तो सिर्फ गंगाजल पीकर ही रह जाते। संन्यासी जीवन की दिनचर्या में प्रेमानंद महाराज के द्वारा कई दिन बिना कुछ खाए-पीए भी बिताया गया।

अब वृंदावन में भक्त दूर दूर से उनके दर्शन करने आते हैं:

वहीं अब प्रेमानंद जी महाराज वृंदावन में रहते हैं। वह प्रेम मंदिर के पास छटीकरा रोड पर श्री कृष्ण शरणम नाम की एक सोसाइटी में रहते हैं। उन्हें पीले बाबा और वृंदावन वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता है। आपको बता दें कि प्रेमानंद जी महाराज राधा रानी के परम भक्त हैं।
 वह उनका भजन-कीर्तन करते हैं और भजन मार्ग एवं कथा के ज़रिए जीवन उद्धार का ज्ञान देते हैं। उनके भजन तथा सत्संग में दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भोलेनाथ के द्वारा स्वयं ही प्रेमानंद जी महाराज को दर्शन दिए गए थे, जिसके बाद ही वह घर छोड़कर वृंदावन आ गए थे।

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