नोएडा स्पोर्ट्स सिटी 9000 करोड़ के घोटाले पर CAG रिपोर्ट ने खोली पोल!: नियमों को ताख़ पर रखकर हुआ आवंटन तो वही खेल सुविधाओं की जगह बनाए गए फ्लैट और..?
नोएडा स्पोर्ट्स सिटी 9000 करोड़ के घोटाले पर CAG रिपोर्ट ने खोली पोल!

नोएडा: उत्तर प्रदेश के नोएडा से करोड़ो रुपयों की धांधली का एक बड़ा मामला सामने आया है। दरअसल एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि नोएडा में स्पोर्ट्स सिटी योजना के नाम पर बिल्डरों को करीब 9000 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ को दिया गया है। 

दरअसल CAG की रिपोर्ट के अनुसार यह योजना राज्य सरकार से बिना किसी औपचारिक स्वीकृति के ही शुरू कर दी गई है। रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है स्पोर्टस सिटी योजना साल 2008 में शुरू की गई थी और आवंटन मई 2011 में किए गए। फिलहाल अब इस पूरे मामले की जांच CBI और ED करने जा रही है।

स्वीकृति से 6 महीने पहले ही कर दिया गया भूमि का आवंटन:

आपको बता दें कि नोएडा प्राधिकरण के द्वारा स्पोर्टस सिटी की योजना को मास्टर प्लान 2031 के अंतर्गत शामिल किया गया था। वहीं बोर्ड के द्वारा अगस्त 2010 में तथा उप्र सरकार से सितंबर 2011 में इसको पास किया गया था। जबकि योजना के अंतर्गत स्पोर्टस सिटी के डेवलपर्स को मार्च 2011 में ही भूमि आवंटन कर दी गई थी।

अतः यह आवंटन राज्य सरकार से बिना कोई औपचारिक अनुमोदन लिए ही किया गया था, यानी स्वीकृति से 6 महीने पहले ही। यही नहीं इस योजना की शुरुआत मनोरंजन हरित क्षेत्र के रूप में की गई थी। जबकि भवन विनियमावली में जरूरी परिवर्तन राज्य सरकार के द्वारा मई 2011 में अधिसूचित किए गए थे। फिलहाल इस पर सीएजी के द्वारा प्राधिकरण से सवाल किए गए हैं।

आइए जानते हैं कि क्या है प्राधिकरण का जवाब:

दरअसल प्राधिकरण के द्वारा अपने जवाब में यह कहा गया है कि स्पोर्टस सिटी के लिए भूमि उपयोग का अनुमोदन उत्तर प्रदेश सरकार से साल 2008 में लिया गया था। प्राधिकरण ने यह भी कहा कि बोर्ड के पास में उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 की धारा-6 तथा 7 के अंतर्गत सभी प्रकार की परिसंपत्तियों की योजना को तैयार करने का तथा उनका निस्तारण करने की शक्ति है। 

 24 फरवरी 1996 में सीईओ को बोर्ड के द्वारा इसका अधिकार दिया गया था। यह जवाब प्राधिकरण के द्वारा अगस्त 2020 में दिया गया था। इस नियम के अंतर्गत सीईओ योजना के नियम एवं शर्त तैयार करने समेत आरक्षित मूल्य निर्धारित करने तथा आवंटन का अनुमोदन करने के लिए भी सक्षम है।

CAG ने कहा कि बिना अनुमति के बनाई गई नई भू उपयोग श्रेणी:

हालांकि प्राधिकरण के इस जवाब से CAG बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सीईओ (CEO) योजना के नियमों एवं शर्तो को तैयार करने की शक्तियों पर ही केंद्रित है। जबकि यहां पर प्राधिकरण के द्वारा सरकार तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी NCR प्लानिंग बोर्ड के बिना ही एक नई भू उपयोग श्रेणी बना दी गई। जिसे मास्टर प्लान 2021 में भी नहीं शामिल किया गया।

इसके अतिरिक्त योजना विनियम 1991 की धारा-11 जो कि इस योजना के आरंभ के समय से ही लागू थी, मास्टर प्लान में महत्वपूर्ण संशोधनों को बिल्कुल प्रतिबंधित करती है। इसलिए भी उक्त परिवर्तन नोएडा के नियंत्रण से परे था। इसलिए नोएडा प्राधिकरण का यह कहना कि उत्तर की उत्तर प्रदेश सरकार से साल 2008 में इसकी स्वीकृति ली गई थी, यह सही नहीं है। 

CAG ने स्पष्ट किया कि क्योंकि स्पोर्टस सिटी के भूमि उपयोग के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की स्वीकृति मई साल 2011 में नोएडा भवन विनियमावली में हुए संशोधन के माध्यम से मिली थी। इसलिए सीएजी के द्वारा यह स्पष्ट कहा गया है कि स्पोर्टस सिटी योजना की शुरुआत ही बिना अनुमोदन के की गई थी, जो कि बिल्कुल अनियमित और नियमों के खिलाफ था।

मुनाफे के लिए बिल्डरों ने 4 भूखंडों को 84 टुकड़ों में बांट दिया:

आपको बता दें कि CAG ने अपनी रिपोर्ट में यह भी दावा किया है कि स्पोर्ट्स सिटी की यह परियोजना 4 भूखंडों के रूप में लाई गई थी। इनमें सेक्टर-78, 79 तथा इसी में एक छोटा हिस्सा सेक्टर-101 भी था। वहीं इन दो के अतिरिक्त सेक्टर-150 तथा 152 में भी यह योजना लाई गई थी। 

लेकिन नियमों को ताख़ पर रखते हुए सिर्फ अपने मुनाफे को ही ध्यान में रखा गया। दरअसल इस योजना में 4 बिल्डरों को सभी भूखंड आवंटित किए गए थे। लेकिन इन बिल्डरों के द्वारा मुनाफे के लिए इन सभी भूखंडों को आगे करीब 84 छोटे-छोटे टुकड़ों में बेच दिया गया।

खेल सुविधाओं की जगह फ्लैट बना कर बिगाड़ दिया पूरा स्वरूप:

दरअसल स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के लिए प्राधिकरण के द्वारा बिल्डरों को सस्ते रेट पर यह जमीन दी गई थी। क्योंकि इसका मकसद था कि यहां पर खेल सुविधाएं अधिक से अधिक विकसित की जा सकें।  दें कि इस परियोजना के लिए आवंटित की गई कुल जमीन में से करीब 70 प्रतिशत हिस्से में खेल सुविधाएं उपलब्ध करानी थी।

जबकि 28 प्रतिशत भूमि पर ग्रुप हाउसिंग तथा 2 प्रतिशत हिस्से में व्यवसायिक संपत्ति को भी बनाया जाना था। लेकिन बिल्डरों के द्वारा प्राधिकरण अधिकारियों से साठगांठ करके परियोजनाओं के अधिक हिस्से यानि 70 प्रतिशत वाले में खेल सुविधाओं के बजाय अपने मुनाफे के लिए फ्लैट बना दिए गए। जिससे परियोजना का पूरा स्वरूप ही बिगाड़ दिया गया।

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