महत्पूर्ण व्यक्तित्व: डॉ. मनमोहन सिंह जी भारतीय राजनीति में अपनी विनम्रता, शालीनता और कुशल आर्थिक नीतियों के लिए जाने जाते हैं। डॉ सिंह ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे। देश के लिए 10 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे डॉ. सिंह का हाल ही में 92 वर्ष की उम्र में दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। उनके जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी रहीं जिन्होंने न केवल उनके व्यक्तित्व को चुनौती दी बल्कि उन्हें गहरा आघात भी पहुंचाया। इसके बावजूद उन्होंने हमेशा देशहित को प्राथमिकता दी। आइए उनके जीवन की कुछ ऐसी ही घटनाओं पर नजर डालते हैं जिन्होंने उन्हें आंतरिक रूप से झकझोर दिया।
1. 2जी और कोयला घोटाले की छाया
प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल आर्थिक सुधारों और नीतिगत स्थिरता के लिए सराहनीय रहा लेकिन यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन जैसे बड़े घोटालों ने उनकी सरकार की छवि को धूमिल किया। इन घोटालों के चलते विपक्ष और मीडिया ने उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े किए। डॉ. सिंह पर "निष्क्रिय प्रधानमंत्री" होने का आरोप लगाया गया जबकि वे व्यक्तिगत रूप से इन घोटालों से जुड़े नहीं थे। इन विवादों के कारण कांग्रेस पार्टी को 2014 के आम चुनाव में ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा। इन घटनाओं ने न केवल डॉ. सिंह को आहत किया बल्कि उनकी सरकार की नीतिगत उपलब्धियों को भी ओवरशैडो कर दिया।
2. राजीव गांधी की "जोकर आयोग" टिप्पणी
1986 में जब राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री थे तब डॉ. मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे। ग्रामीण विकास पर एक प्रस्तुति के दौरान राजीव गांधी ने उनके प्रयासों की सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हुए योजना आयोग को "जोकर आयोग" की उपाधि दे दी। इस टिप्पणी ने डॉ. सिंह को व्यक्तिगत रूप से गहरा आघात पहुंचाया। वे इस अपमान से इतने व्यथित हुए कि इस्तीफा देने का मन बना लिया। हालांकि दोस्तों और सहयोगियों ने उन्हें समझाया कि देश के हित में इस निर्णय को टालना बेहतर होगा। इसके बावजूद इस घटना के बाद डॉ. सिंह को उनके कार्यकाल के दौरान बार-बार साइडलाइन किया गया। अंततः उन्होंने 1987 में योजना आयोग से इस्तीफा दे दिया।
3. "एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" की उपाधि
डॉ. सिंह को उनके प्रधानमंत्री बनने के तरीके को लेकर कई बार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उन्हें "एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" कहा गया क्योंकि 2004 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया और इस पद के लिए डॉ. सिंह को चुना। यह टिप्पणी उनके आलोचकों द्वारा अक्सर की जाती रही। 2019 में एक फिल्म "द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" भी आई जो संजय बारू की किताब पर आधारित थी। इस फिल्म और किताब में डॉ. सिंह को ऐसे नेता के रूप में दिखाया गया जो अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थे। इस उपाधि ने उन्हें हमेशा व्यथित किया।
4. अध्यादेश पर राहुल गांधी का विरोध
2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने अपराधियों को राजनीति से दूर रखने के लिए एक अहम फैसला सुनाया तो डॉ. सिंह की सरकार ने इसे पलटने के लिए एक अध्यादेश लाने का निर्णय लिया। कैबिनेट ने इस अध्यादेश को मंजूरी भी दे दी। लेकिन जब यह मुद्दा मीडिया और विपक्ष में चर्चा का विषय बना तो राहुल गांधी ने सार्वजनिक तौर पर इसे "बकवास" कहकर खारिज कर दिया और अध्यादेश को फाड़ने की बात कही। यह बयान प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा के लिए एक बड़ा झटका था। डॉ. सिंह इस घटना से गहरे आहत हुए लेकिन उन्होंने इसे लेकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी।
5. 1984 के सिख दंगों पर माफी
1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए डॉ. मनमोहन सिंह ने 2005 में लोकसभा में सार्वजनिक माफी मांगी। उन्होंने कहा, "देश में जो कुछ हुआ उसके लिए मैं शर्मिंदा हूं और मैं अपना सिर झुकाता हूं।" इस माफी ने उनके नेतृत्व में सिख समुदाय के घावों को कुछ हद तक भरने का प्रयास किया। हालांकि उनके लिए यह घटना व्यक्तिगत रूप से गहरा दर्द लेकर आई क्योंकि वह खुद सिख समुदाय से थे और उस त्रासदी ने उन्हें अंदर से झकझोर दिया था।
डॉ. मनमोहन सिंह का जीवन उनकी नीतियों और विचारधारा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का उदाहरण है। उन्होंने कई बार व्यक्तिगत अपमान और आलोचनाओं को सहन करते हुए देशहित को सर्वोपरि रखा। इन चार घटनाओं ने भले ही उन्हें आंतरिक रूप से झकझोर दिया हो, लेकिन उन्होंने अपने धैर्य, दृढ़ता और समर्पण से यह साबित कर दिया कि नेतृत्व का असली अर्थ कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है।