लखनऊ: उत्तर प्रदेश में भाजपा, प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए अबकी बार दलित चेहरे को मौका देने की रणनीति बना रही है। पार्टी का मानना है कि अब तक प्रदेश में भाजपा या जनसंघ के किसी दलित नेता को यह पद नहीं मिला है। ऐसे में पार्टी नया प्रयोग कर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपनी सियासी जमीन मजबूत करना चाहती है। इसके जरिए भाजपा विपक्ष के पीडीए फार्मूले में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
हाल ही में भाजपा ने 70 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में पिछड़े वर्ग को भरपूर प्रतिनिधित्व देकर यह संकेत दिया था कि पार्टी सामाजिक संतुलन बनाने में जुटी है। हालांकि इनमें दलित वर्ग की भागीदारी अपेक्षाकृत कम थी। अब पार्टी इस कमी को पूरा करने के लिए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के पद पर दलित नेता बैठने की कोशिश में लगी है।
भाजपा के लिए क्यूँ जरूरी है दलित वर्ग का साथ?
भाजपा का मानना है कि दलित वर्ग को साधे बिना प्रदेश में सत्ता बनाए रखना मुश्किल होगा। बसपा प्रमुख मायावती एक बार फिर अपने दलित वोट बैंक को एकजुट करने में सक्रिय हो रही हैं। वहीं आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर भी दलित युवाओं में पैठ बना रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा अपने कोर दलित वोट बैंक को साधे रखना चाहती है।
भाजपा को अब तक खटिक और वाल्मीकि समाज का मजबूत समर्थन मिला है। ये समुदाय हिंदुत्व विचारधारा के प्रति भी खासे प्रतिबद्ध रहे हैं। जबकि दलित समाज की अन्य जातियां समय-समय पर दूसरे दलों की ओर रुख करती रहती हैं। ऐसे में भाजपा का प्रयास है कि प्रदेश अध्यक्ष पद पर दलित चेहरे को बैठाकर पूरे दलित समाज में यह संदेश दिया जाए कि भाजपा में उनकी भी बराबर अहमियत है।
यूपी में अब तक एक बार भी नहीं बना कोई दलित प्रदेश अध्यक्ष
भाजपा में अब तक दलित नेतृत्व को सीमित अवसर ही मिले हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दलित चेहरे के तौर पर सिर्फ बंगारू लक्ष्मण को भाजपा का अध्यक्ष बनने का मौका मिला था। जबकि यूपी में अब तक किसी दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया गया। ऐसे में भाजपा इस बार नया प्रयोग कर यह दिखाना चाहती है कि पार्टी में पिछड़ों के साथ दलितों को भी समान महत्व दिया जा रहा है।
इन नामों पर हो रही है चर्चा?
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कई नामों पर मंथन कर रही है। पार्टी का झुकाव ऐसे व्यक्ति की ओर है जो संघ का स्वयंसेवक रहा हो और संगठन संचालन का अनुभव रखता हो। इससे पार्टी को संघ परिवार की भी सहज स्वीकृति मिल जाएगी।
2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी पार्टी
भाजपा का यह कदम आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है। पार्टी चाहती है कि दलित समाज को बड़े पद पर प्रतिनिधित्व देकर उनका भरोसा जीता जाए और विपक्ष के पीडीए फॉर्मूले को कमजोर किया जाए।