ग्रामीण लोगों के आहार में प्रोटीन की कमी बनी चिंता का विषय!: प्रोटीन की आवश्यकता से अनजान ग्रामीणों का नहीं हो रहा विकास, सरकारी योजनाओं में?
ग्रामीण लोगों के आहार में प्रोटीन की कमी बनी चिंता का विषय!

सेहत: भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के खाने में प्रोटीन की मात्रा तेजी से घट रही है यहां के लोग इसकी उपलब्धता और आर्थिक सामर्थ्य होने के बावजूद इसे अपने आहार का हिस्सा नहीं बना पा रहे हैं। समस्या यह नहीं है कि ग्रामीण लोग दालें, दूध, अंडे या मांस नहीं खरीद सकते या उनका उत्पादन नहीं कर सकते बल्कि असली दिक्कत यह है कि उन्हें प्रोटीन की अहमियत का अंदाजा ही नहीं है।

अध्ययन में सामने आई प्रोटीन की कमी की वजह

इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स, इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट और सेंटर फॉर इकोनॉमिक एंड सोशल स्टडीज द्वारा किए गए एक अध्ययन में छह राज्यों के नौ जिलों के ग्रामीण इलाकों में सर्वे किया गया। सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले थे ग्रामीणों का आहार मुख्य रूप से चावल और गेहूं जैसे अनाजों पर आधारित था जो उनके कुल प्रोटीन सेवन का 60-75% हिस्सा पूरा करते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि इन अनाजों में जरूरी अमीनो एसिड नहीं होते जिससे पोषण संतुलन बिगड़ जाता है।

प्रोटीन की अहमियत को समझना जरूरी

स्वस्थ आहार में 20-25% प्रोटीन, 65% कार्बोहाइड्रेट और 10-15% वसा होना चाहिए। प्रोटीन शरीर के विकास, मांसपेशियों की मजबूती और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है। यह 20 तरह के अमीनो एसिड से मिलकर बनता है जिनमें से कुछ शरीर में नहीं बनते इसलिए इन्हें भोजन के जरिए लेना जरूरी होता है।

सरकारी योजनाएं सिर्फ बढ़ा रहीं कैलोरी

सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत ग्रामीण परिवारों को सब्सिडी पर सस्ता अनाज मिलता है। इससे उनकी कैलोरी की जरूरत तो पूरी हो जाती है लेकिन आहार में पोषण का संतुलन गड़बड़ा जाता है क्योंकि यह प्रणाली प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को बढ़ावा नहीं देती। स्वास्थ्य सेवाओं और आंगनवाड़ी जैसे सामुदायिक नेटवर्क भी पोषण जागरूकता बढ़ाने के क्षेत्र में काम नहीं कर रहे है।

जागरूकता की कमी है सबसे बड़ी वजह

अध्ययन के मुताबिक ग्रामीणों में प्रोटीन की कमी का सबसे बड़ा कारण पैसे की कमी नहीं बल्कि जानकारी का अभाव है। कई लोग यह जानते ही नहीं है कि उनके आहार में प्रोटीन की कितनी अहम भूमिका है। इसके अलावा कुछ सांस्कृतिक मान्यताएं और खानपान की आदतें भी प्रोटीन सेवन को सीमित कर देती हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए पोषण शिक्षा, सरकारी योजनाओं में बदलाव और स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

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