भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा!: जलवायु परिवर्तन से हर साल GDP को हो सकता है 3% का नुकसान, फिलहाल कार्बन उत्सर्जन के मामले में दूसरे देशों से बेहतर है भारत की स्थिति?
भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा!

पर्यावरण: भारत और पूरी दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 में इस बात पर विशेष रूप से जोर दिया गया है कि अगर वैश्विक तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो इससे वैश्विक GDP में लगभग 12% तक की गिरावट आ सकती है। वहीं Advancing Earth and Space Science के अध्ययन के अनुसार भारत की GDP पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा और यह हर साल करीब 3% तक घट सकती है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए न केवल आर्थिक विकास बल्कि समावेशी और सतत विकास पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए भारत दुनिया का 7वां सबसे अधिक संवेदनशील देश माना गया है। यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक मजबूत और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन की आर्थिक लागत

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2016 से 2022 के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किए गए खर्च में सकल घरेलू उत्पाद में करीब 2% तक की वृद्धि देखी गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार इस चुनौती को गंभीरता से ले रही है। इस खर्च का उद्देश्य अनुकूलन और लचीलापन बढ़ाने के साथ-साथ विकास को अधिक टिकाऊ बनाना है।q

सीईईडब्ल्यू (Council on Energy, Environment, and Water) के निदेशक डॉ. ध्रुबा पुरकायस्थ के अनुसार, "भारत की अर्थव्यवस्था में निरंतर विकास, कम चालू खाता घाटा और सुव्यवस्थित बैंकिंग प्रणाली जैसे संकेतक देश को एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में मजबूत आधार प्रदान कर रहे हैं।" उनका मानना है कि भारत जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में भी बेहतर स्थिति में है और 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तैयार है।

भारत का कार्बन उत्सर्जन और अक्षय ऊर्जा की दिशा में प्रगति

भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत से काफी कम है जो इस बात का संकेत है कि देश सही दिशा में काम कर रहा है। हालांकि अक्षय ऊर्जा को बड़े पैमाने पर अपनाने में कई चुनौतियां भी हैं जैसे कि ऊर्जा भंडारण की सीमाएं, तकनीकी संसाधनों की कमी और खनिजों तक पहुंच में बाधाएं।

भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश का लक्ष्य है कि 2030 तक कुल बिजली उत्पादन का 50% हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त किया जाए। अच्छी खबर यह है कि नवंबर 2024 तक यह आंकड़ा 46.8% तक पहुंच चुका है। हालांकि कोयला आधारित संयंत्रों को पूरी तरह से बंद करने के बजाय भारत सुपर-क्रिटिकल, अल्ट्रा-सुपर-क्रिटिकल और एडवांस्ड अल्ट्रा-सुपर-क्रिटिकल प्रौद्योगिकियों के जरिए उत्सर्जन को कम करने की दिशा में काम कर रहा है।

कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन का असर कृषि पर भी पड़ रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि बदलते मौसम के कारण सूखा, बाढ़ और असामान्य तापमान जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं जो फसल उत्पादन के लिए गंभीर खतरा हैं।

इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने जलवायु के अनुकूल बीजों के विकास पर जोर दिया है। ICAR के वैज्ञानिक डॉ. ज्ञान प्रकाश मिश्रा के अनुसार हाल ही में सरकार ने 109 नई किस्मों के बीज बाजार में उतारे हैं जिनमें से कुछ बायो-फोर्टिफाइड हैं और सामान्य किस्मों की तुलना में अधिक पोषण प्रदान करते हैं। यह बीज सूखा, बाढ़ जैसी चरम स्थितियों में भी उत्पादन बनाए रखने में मददगार हैं।

इसके अतिरिक्त किसानों को फसल पद्धतियों में बदलाव, जल संसाधनों के संरक्षण और सूखे प्रतिरोधी किस्मों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम किया जा सके।

शहरी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां

भारत के शहरी इलाकों में भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव गंभीर होते जा रहे हैं। इस वर्ष दिल्ली सहित कई शहरों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और हीटवेव का अनुभव किया गया जो आने वाले समय में और भी गंभीर हो सकता है।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार हमें शहरी बाढ़, बढ़ती गर्मी और जल संकट से निपटने के लिए स्मार्ट सिटी मिशन और अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन जैसी योजनाओं को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। तटीय क्षेत्रों में भूमि के कटाव को रोकने के लिए मैंग्रोव वनों का संरक्षण और समुद्री दीवारों का निर्माण किया जा रहा है।

पेयजल संकट को देखते हुए जल शक्ति अभियान और राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण परियोजना के माध्यम से जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

वायु प्रदूषण: एक और गंभीर चुनौती

भारत में वायु प्रदूषण भी एक प्रमुख पर्यावरणीय समस्या है खासकर दिल्ली और NCR क्षेत्र में। आर्थिक सर्वेक्षण में इसे गंभीर चिंता का विषय बताया गया है।

वायु प्रदूषण को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। इसके अलावा पराली जलाने की समस्या को कम करने के लिए किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी खरीदने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता

हालांकि भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं लेकिन इस दिशा में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सहायता अभी भी अपर्याप्त है। CoP29 के परिणाम भी इस मामले में बहुत उत्साहजनक नहीं रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत को घरेलू संसाधनों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती को स्वीकार करते हुए विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करनी चाहिए ताकि वे सतत विकास के अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।

आगे की राह?

आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 यह स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना न केवल पर्यावरण की दृष्टि से बल्कि आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है।

भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समावेशी, लचीला और सतत विकास मॉडल को अपनाना होगा। अक्षय ऊर्जा के विस्तार, जल संसाधनों के संरक्षण और कृषि में नवाचार के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्मार्ट समाधान विकसित करने होंगे।

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए सरकार और समाज को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। यदि हम आज से ही ठोस कदम उठाएं तो न केवल हम इस चुनौती का सामना कर सकते हैं बल्कि एक बेहतर, स्वच्छ और हरित भविष्य की ओर भी अग्रसर हो सकते हैं।

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